चलो बताओ कौनसी कहानी सुनाओगे
कोई नई पेश होगी या फिर पुराणीवाली दोहराओगे

कुछ दिन शुरू के रोज़ बातें होंगी
फिर दिन लम्बे काम के और रातें घर वालों के नाम होंगी
वह नाजुक से पल जब दिल धड़का था
किसी डायरी में कर देंगे कैद उन्हें
फिर किताबों में छुपी शायरी
लब्ज़ दर लब्ज़ बयान होंगी
कोई शाम लम्बी सी
एक साथ गुजरेंगे
चांदनी में नहाते हुए
तारे किसी शाम गिने जायेंगे
कभी तुम खफा
कभी हम भी अपना इरादा आजमाएंगे
कहानी अधूरी रहेगी या पूरी करेंगे
हम येह ढूँढ़ने की कोशिश में लग जायेंगे
कुछ दिन तो ऐसेही गुजरेंगे
कुछ दिन हम एकसाथ होने किस कोशिश में गुजरेंगे
किसी शाम फिर वापस घर की याद आएगी तुम्हे
किसी शाम तुम घर लोट जाओगे
फिर गुजरेंगे लम्बे दिन ऑफिस के कामों में
और तनहा रातें गुरेंगी बीते दिनों की यादों में