
कुछ दिन नहीं लिखने से
कुछ बदल नहीं जाता
कहानिया तभी वही थी
अभी वही हे
कुछ लोग शायद आगे बढ़ जायेंगे
कुछ यादें धुंधलीसी नजर आएंगी
पर कुछ दिन नहीं लिखने से
कुछ बदल नहीं जाता
मेरा वक़्त, मेरा आसमान
मेरी जमीं, मेरी पहचान
कहने की तोह चार बातें है
एक “माँ” की पुकार से सब की सब पीछे छूट जाती है
सच है कुछ दिन नहीं लिखने से
कुछ बदल नहीं जाता
पहाड़, पेड़, नदी, ऑफिस का कंपाउंड, घर का दरवाजा,
आंगन की तुलसी, किचन के मंच पे जलता चूला
सब शांत, सब आतुर, तेरी नहीं उड़न के लिए,
नए प्रोजेक्ट, नयी ट्रैकर, नयी टीम, नयी अचीवमेंट शीट
तभी वही था, अभी वही है
कुछ दिन नहीं लिखने से
कुछ बदल नहीं जाता